सात मई की सुबह ने अभी दस्तक ही दी थी. विशाखापट्टनम के बाहरी इलाक़े में एलजी पॉलिमर्स की फैक्ट्री के आसपास रहने वालों लोगों का दिन शुरू ही हो रहा था कि अचानक उन्हें हवा में एक अजीब बदबू महसूस होने लगी.

थोड़ी ही देर में उनकी आंखों में खुजली और जलन होने लगी. लोग तुरंत अपने घरों से निकल सड़कों की ओर भागे और जो सोए हुए थे उन्हें भी घरों से तुरंत निकलने लिए आवाज़ लगाने लगे. लोगों का हुजूम बेतहाशा भागता दिखा. उस सुबह के कई वीडियो में लोग सांस लेने के लिए जद्दोजहद करते दिखे. वे बेहोश होकर सड़कों पर गिरते जा रहे थे.

आनन-फ़ानन में हज़ारों लोगों को वहां से बाहर निकाला गया. सैकड़ों लोगों को अस्पताल में भर्ती कराया गया. उन्हें सांस लेने में दिक़्क़त हो रही थी. गैस लीक होने से 12 लोगों की मौत हो गई. इनमें दो बच्चे थे. जानवरों की भी मौत हुई. गाय, भैंस और कुत्ते समेत 32 जानवर मारे गए. जो लोग बच गए थे उन्हें अब रेगुलर हेल्थ-चेक अप की ज़रूरत पड़ेगी क्योंकि गैस का असर उनके शरीर में अभी कुछ वक़्त तक रह सकता है.

दरअसल, विशाखापट्टनम के बाहरी इलाक़े में मौजूद एलजी केम. की इस फैक्ट्री में हादसे से जो मौतें हुईं वे स्टाइरीन गैस के वाष्प का नतीजा थीं. यह सांस के साथ लोगों के शरीर के अंदर चला गया. स्टाइरीन गैस का वाष्प एक विषैला रसायन है. इस फैक्ट्री से यही रसायन भाप बन कर लीक हुआ था.

अगले दिन पुलिस ने पुलिस ने कंपनी प्रबंधन के ख़िलाफ़ ग़ैर-इरादतन हत्या का मामला दर्ज कर लिया. पुलिस के आरोप के मुताबिक़ कंपनी प्रबंधन की लापरवाही की वजह से ये मौतें हुईं.

बीबीसी तेलुगू ने इस मामले की पड़ताल की. फैक्ट्री की जांच रिपोर्टों के साथ ही अधिकारियों और कंपनी के पूर्व अधिकारियों से बातचीत में इसके प्रमाण मिले हैं. यह भी पता चला कि प्लांट चलाने के लिए जिन पर्यावरण क्लियरेंस की ज़रूरत थी, वे नहीं लिए गए थे. इनके बगैर ही इस फैक्ट्री में प्रोडक्शन हो रहा था.

बीबीसी ने एलजी से इस बारे में सवाल पूछे थे लेकिन उनका कोई जवाब नहीं मिला. हालांकि इससे पहले कंपनी की ओर से जारी एक बयान में कहा गया था कि वह गैस लीक की वजह का पता कर रही है.

'मुझे तो इंसाफ चाहिए'

एलजी पॉलिमर्स प्लांट के गेट के बाहर अपनी बेटी की लाश लिए खड़ी एन लता ने कहा, ''मेरी बेटी दो सप्ताह में सात साल की होने वाली थी. हम उसका जन्मदिन मनाते.''

9 मई को लता और उनके जैसे सैकड़ों लोग फैक्ट्री के बाहर विरोध प्रदर्शन के बाहर जमा हो गए थे. वे इस प्लांट को बंद करने की मांग कर रहे थे. लता की तरह कई और लोग अपने परिजनों की लाश लेकर वहां जमा थे. गैस लीक से कइयों ने अपने प्रिय जनों को खो दिया था.

घटनास्थल पर पहुंचे एक सीनियर पुलिस के सामने रोते हुए लता कहती हैं, ''अब मैं कैसे ज़िंदा रहूंगी. मुझे इंसाफ़ चाहिए. दया करके यह फैक्ट्री बंद कर दो. आपको मेरे साथ न्याय करना ही पड़ेगा.''

प्लांट से गैस रिसाव अब बंद किया जा चुका है. लेकिन अब भी पूरे इलाक़े में गैस की बदबू फैली हुई है. फैक्ट्री के सामने लगे पेड़ बदरंग हो चुके हैं. आसपास के बागानों में लगे केले के पेड़ काले पड़ चुके हैं और छूने पर पत्थर जैसे लग रहे हैं.

अधिकारियों ने बताया कि उन्होंने जांच के लिए इस इलाक़े के पानी, मिट्टी और सब्ज़ियों के सैंपल लिए हैं और नतीजों के आने का इंतजार कर रहे हैं. शहर के कमिश्नर सृजन गुमाला ने कहा कि स्थानीय लोगों को यहां के खाने की चीज़ों और पानी का इस्तेमाल न करने को कहा गया है. अधिकारियों ने कहा कि लोगों के लिए बाहर से पानी के टैंकर लाए गए हैं.

कैसे हुआ गैस हुआ रिसाव?

कोरोना वायरस संक्रमण को फैलने से रोकने के लिए 24 मार्च के लॉकडाउन के बाद पहली बार इस प्लांट को खोलने की तैयारी चल रही थी. भले ही यह प्लांट विशाखानपट्टनम के बाहरी इलाक़े में हैं लेकिन इसके पास घनी आबादी है. यहां कई गाँव भी है. दरअसल, हाल के वर्षों में विशाखापट्टनम का काफ़ी विस्तार हुआ है और आबादी बाहरी इलाक़ों तक चली गई है.

यह फैक्ट्री 1961 में बनी थी. इसमें स्टाइरीन के पॉलिमर्स बनते थे. यह ज्वलनशील द्रव है. इसका इस्तेमाल ऐसे बहुपयोगी प्लास्टिक बनाने में होता है, जो फ्रिज, एयरकंडीशन से लेकर फूड कंटेनर और डिस्पोजेबल टेबलवेयर बनाने में काम आते हैं.

स्टाइरीन टैंकों में 20 डिग्री सेंटिग्रेड के नीचे के तापमान पर गैस रखी जाती है क्योंकि यह तेज़ी से भाप बन कर उड़ जाती है. इस तापमान पर लगातार निगरानी रखनी होती है. सूत्रों का कहना है कि सात मई को तापमान काफ़ी बढ़ गया था, जिस वजह स्टाइरीन गैस लीक हो गई.

सूत्रों ने बीबीसी को बताया कि स्टाइरीन के टैंकों के तापमान पर नज़र रखने के लिए तीन पालियों में लोग काम करते थे लेकिन लॉकडाउन के दौरान सिर्फ़ एक पाली में ही लोग काम कर रहे थे. अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने स्टाइरीन टैंकों के तापमान पर निगरानी के एलजी के 15 कर्मचारियों को परमिट दिए थे.

एक अधिकारी ने कहा, "लगता है कि लॉकडाउन के दौरान गैस टैंकों के तापमान के मेंटनेंस और सुरक्षा में चूक हुई है. यहां तक कि जब गैस लीक हुई तो इमर्जेंसी सायरन भी नहीं बजा.'' स्थानीय लोगों ने बीबीसी को बताया कि जिस दिन गैस का रिसाव हुआ उस दिन कोई सायरन नहीं बजा. यहां तक कि उन्होंने 2017 के बाद इमर्जेंसी सायरन ही नहीं सुना है.

प्लांट के पूर्व कर्मचारियों ने बताया कि पहले हर बार शिफ़्ट बदलने के दौरान सायरन बजता था. इमर्जेंसी के दौरान भी सायरन बजाने का नियम है. लेकिन एक पूर्व प्रबंध निदेशक ने रोज़ाना सायरन बजाने का नियम बंद करा दिया था.

एक पूर्व कर्मचारी ने कहा, "चूंकि सायरन का इस्तेमाल लंबे वक्त से नहीं हुआ था इसलिए इसने काम करना बंद कर दिया था. हमने एक बार फैक्ट्री निरीक्षण के दौरान यह मामला उठाया था लेकिन अफसर ने इसे हँसी में उड़ा दिया. "

नेशनल इन्वॉइरन्मेंट ट्राइब्यूनल के सदस्य पी जगन्नाथ राव ने कहा, " कंपनी ने कहा है कि सायरन बजा था लेकिन हो सकता है कि लोगों ने दहशत में इसकी आवाज़ न सुनी हो. हालांकि इसकी जांच करनी होगी." जगन्नाथ घटनास्थल की शुरुआती जांच करने वाली टीम के सदस्य हैं.

प्लांट का ख़राब रिकार्ड

बीबीसी ने फैक्टरी की जांच के रिकार्ड देखे हैं. श्रम विभाग के निरीक्षण के पुराने रिकॉर्ड बताते हैं कि फैक्ट्री का रखरखाव सही नहीं था.

अगस्त, 2016 की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि स्टाइरीन गैस के टैंक की सुरक्षा के लिए सीमेंट की जो परत लगाई जाती है, वह झड़ चुकी है. यहां नए सिरे से परत चढ़ाए जाने की ज़रूरत है.

दिसंबर, 2019 की एक रिपोर्ट बताती है कि एक टैंक में पानी छिड़काव के लिए इस्तेमाल होने वाले यंत्र के एक पाइप में जंग लग गया है. इन यंत्रों से पानी छिड़क कर टैंकों का तापमान कम किया जाता है. इसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि एक और जहरीली गैस पेंटेंन रखने के लिए इस्तेमाल हो रहे टैंकों में से एक ख़राब मेंटनेंस का शिकार है.

रिपोर्ट में कहा है कि कंपनी को स्टाइरीन गैस के टैंकों के चारों ओर एक दीवार ख़ड़ी करनी चाहिए और सेफ्टी ऑडिट कराना चाहिए. कंपनी और इसके अधिकारियों से बीबीसी ने इस बारे में सवाल पूछे थे लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया है.

पी जगन्नाथ राव ने बीबीसी से कहा कि जिन टैंकों में स्टाइरीन रखी गई थी वे पुराने पड़ चुके थे. उन्होंने कहा, " नए टैंकों में सेंसर और मॉनिटर सिस्टम होता है लेकिन पुराने में यह टेक्नॉलजी नहीं होती. शुक्र है टैंकों का सेफ्टी वॉल्व काम कर रहा था नहीं तो हादसा और बड़ा हो सकता था."

गैस रिसाव के कुछ दिन बात पता चला कि एलजी पॉलिमर्स के इस प्लांट में 2017 से ही बगैर ज़रूरी पर्यावरण क्लियरेंस के काम चल रहा था. कंपनी के लिए यह ज़रूरी था कि वह नए प्रोडक्ट बनाने के लिए प्रोडक्शन बढ़ाने के फैसले से पहले पर्यावरण क्लियरेंस ले. इसके लिए इसने 22 दिसंबर 2017 को केंद्र सरकार को अपना आवेदन भेजा था.

12 अप्रैल, 2018 को कंपनी ने अपना यह पुराना आवेदन वापस ले लिया था उसी दिन नए सिरे से आवेदन दिया था. लेकिन इस बार इसने राज्य सरकार को आवेदन भेजा था, केंद्र सरकार को नहीं. इसके दूसरे आवेदन में एक शपथपत्र लगा था. बीबीसी ने यह आवेदन देखा है.

इसमें कंपनी में यह स्वीकार किया है कि प्लांट चलाने के लिए जो जरूरी पर्यावरण क्लियरेंस चाहिए वह इसके पास नहीं है. इसके बगैर ही प्लांट चल रहा है लेकिन ऐसा वह राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से जारी सहमति पत्र के आधार पर कर रही है.

एलजी समेत कई कंपनियों ने बगैर क्लियरेंस लेकर उत्पादन शुरू करके नियमों का उल्लंघन किया है. क्लियरेंस के लिए आवेदन करने वाली सभी कंपनियों को केंद्र सरकार ने 2017 में कहा था कि उत्पादन शुरू होने के बाद उन्हें यह अनुमति दे दी जाएगी.

शुरू में केंद्र सरकार के पास ही यह अधिकार था. लेकिन मार्च, 2018 में इसने कहा कि राज्य सरकारें इस तरह के क्लियरेंस दे सकती हैं. इसके बावजूद एलजी पॉलिमर्स के पास बगैर पर्यावरण क्लियरेंस के प्लांट चलाने की अनुमति नहीं थी. बीबीसी ने अधिकारियों से इस बारे में सवाल किए थे लेकिन अभी तक उनका जवाब नहीं आया है.

एलजी पॉलिमर्स में गैस रिसाव की घटना के बाद सरकार कटघरे में हैं. सुरक्षा और पर्यावरण क़ानून के उल्लंघन की ओर आंखें मूंदे रखने की वजह से इसकी खासी आलोचना हो रही है. भारत में सुरक्षा और पर्यावरण मानकों की अनदेखी की वजह से होने वाली औद्योगिक दुर्घटनाएं अक्सर सुर्खियां बनती हैं. 1984 में भोपाल में यूनियन कार्बाइड प्लांट में बड़ा गैस रिसाव हुआ था और इसमें हज़ारों लोग मारे गए थे. कम से कम पाँच लाख लोग हादसे की वजह से स्थायी रूप से बीमार हो गए थे.

एलजी प्लांट में हुए इस हादसे को लेकर पूर्व ब्यूरोक्रेट्स ईएएस शर्मा ने सरकार को लिखी चिट्ठी में कहा है कि कंपनियों को उत्पादन की अनुमति देने से पहले यूनिटों की ठीक से जांच नहीं होती. बगैर क्लयिरेंस के अनुमति देने की वजह से कंपनियां कड़ी तकनीकी जांच से बच निकलती हैं.

शर्मा ने पर्यावरण मंत्रालय पर लोगों की ज़िंदगी को ख़तरे में डालने और पर्यावरण को नुक़सान पहुंचाने का आरोप लगाया है. इस बीच, विशाखापट्टनम में लोगों का कहना है कि वह एलजी के इस प्लांट को हमेशा के लिए बंद कराने के लिए क़ानूनी विकल्प तलाश रहे हैं.

प्लांट प्रबंधन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में शामिल स्थानीय निवासी मुरली अंबाती ने कहा, "अभी भी मॉर्निंग वॉक पर जाते समय हमें गैस की दुर्गंध आती है. हमने इस प्लांट के संभावित ख़तरे के बारे में पहले भी आवाज उठाई थी, हमने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से भी इसके लचर रखरखाव की शिकायत की थी लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई. "

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